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Tuesday, November 16, 2010

अनैतिकता

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आचार्य तुलसी के सत्संग के लिए दूर-दूर से लोग पहुंचा करते थे। एक बार किसी जिज्ञासु ने उनसे पूछ लिया, ‘परलोक सुधारने के लिए क्या उपाय किए जाने चाहिए?’ आचार्यश्री ने कहा, ‘पहले तुम्हारा वर्तमान जीवन कैसा है या तुम्हारा विचार व आचरण कैसा है, इस पर विचार करो। इस लोक में हम सदाचार का पालन नहीं करते, नैतिक मूल्यों पर नहीं चलते और मंत्र-तंत्र या कर्मकांड से परलोक को कल्याणमय बना लेंगे, यह भ्रांति पालते रहते हैं।
आचार्य महाप्रज्ञ प्रवचन में कहा करते थे, ‘धर्म की पहली कसौटी है आचार, और आचार में भी नैतिकता का आचरण। ईमानदारी और सचाई जिसके जीवन में है, उसे दूसरी चिंता नहीं करनी चाहिए।
एक बार उन्होंने सत्संग में कहा, ‘उपवास, आराधना, मंत्र-जाप, धर्म चर्चा आदि धार्मिक क्रियाओं का तात्कालिक फल यह होना चाहिए कि व्यक्ति का जीवन पवित्र बने। वह कभी कोई अनैतिक कर्म न करे और सत्य पर अटल रहे। अगर ऐसा होता है, तो हम मान सकते हैं कि धर्म का परिणाम उसके जीवन में आ रहा है। यह परिणाम सामने न आए, तो फिर सोचना पड़ता है कि औषधि ली जा रही है, पर रोग का शमन नहीं हो रहा। चिंता यह भी होने लगती है कि कहीं हम नकली औषधि का इस्तेमाल तो नहीं कर रहे।
आज सबसे बड़ी विडंबना यह है कि आदमी इस लोक में सुख-सुविधाएं जुटाने के लिए अनैतिकता का सहारा लेने में नहीं हिचकिचाता। वह धर्म के बाह्य आडंबरों कथा-कीर्तन, यज्ञ, तीर्थयात्रा, मंदिर दर्शन आदि के माध्यम से परलोक के कल्याण का पुण्य अर्जित करने का ताना-बाना बुनने में लगा रहता है

Sunday, October 3, 2010

विश्‍वास और श्रद्धा

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भगवान बुद्ध धर्म प्रचार करते हुए काशी की ओर जा रहे थे। रास्ते में जो भी उनके सत्संग के लिए आता, उसे वह बुराइयां त्यागकर अच्छा बनने का उपदेश देते। उसी दौरान उन्हें उपक नाम का एक गृहत्यागी मिला। वह गृहस्थ को सांसारिक प्रपंच मानता था और किसी मार्गदर्शक की खोज में था। भगवान बुद्ध के तेजस्वी निश्छल मुख को देखते ही वह मंत्रमुग्ध होकर खड़ा हो गया। उसे लगा कि पहली बार किसी का चेहरा देखकर उसे अनूठी शांति मिली है। उसने अत्यंत विनम्रता से पूछा, ‘मुझे आभास हो रहा है कि आपने पूर्णता को प्राप्त कर लिया है?’ बुद्ध ने कहा, ‘हां, यह सच है। मैंने निर्वाणिक अवस्था प्राप्त कर ली है।
उपक यह सुनकर और प्रभावित हुआ। उसने पूछा, ‘आपका मार्गदर्शक गुरु कौन है?’ बुद्ध ने कहा, ‘मैंने किसी को गुरु नहीं बनाया। मुक्ति का सही मार्ग मैंने स्वयं खोजा है।
क्या आपने बिना गुरु के तृष्णा का षय कर लिया है?’
बुद्ध ने कहा, ‘हां, मैं तमाम प्रकार के पापों के कारणों से पूरी तरह मुक्त होकर सम्यक बुद्ध हो गया हूं।
उपक को लगा कि बुद्ध अहंकारवश ऐसा दावा कर रहे हैं। कुछ ही दिनों में उसका मन भटकने लगा। एक शिकारी की युवा पुत्री पर मुग्ध होकर उसने उससे िवाह कर लिया। फिर उसे लगने लगा कि अपने माता-पिता परिवार का त्यागकर उनसे एक प्रकार का विश्वासघात किया है। वह फिर बुद्ध के पास पहुंचा। संशय ने पूर्ण विश्वास श्रद्धा का स्थान ले लिया। वह बुद्ध की सेवा-सत्संग करके स्वयं भी मुक्ति पथ का पथिक बन गया।

Saturday, July 17, 2010

अहंकार

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राजगृह के  कोषाध्यक्ष की पुत्री भद्रा बचपन से ही प्रतिभाशाली थी।  माता-पिता की इच्छा के विरुद्ध  विवाह कर लिया। विवाह के बाद उसे पता चला कि    वह युवक दुर्व्यसनी और अपराधी किस्म का है। एक दिन उस युवक ने भद्रा के तमाम आभूषण कब्जे में ले लिए और उसकी हत्या का प्रयास किया। पर भद्रा ने युक्तिपूर्वक अपनी जान बचा ली। इस घटना ने उसमें सांसारिक सुख से विरक्ति की भावना पैदा कर दी। वह भिक्षुणी बन गई। अल्प समय में ही उसने शास्त्रों का अध्ययन कर लिया और उसकी ख्याति विद्वान साध्वियों में होने लगी। भद्रा को अहंकार हो गया कि वह सबसे बड़ी शास्त्रज्ञ है। उसने पंडितों को शास्त्रार्थ के लिए ललकारना शुरू कर दिया। एक बार वह श्रावस्ती पहुंची। उसे पता चला कि अग्रशावक सारिपुत्र प्रकांड पंडित माने जाते हैं। भद्रा ने सारिपुत्र को शास्त्रार्थ की चुनौती दे डाली। उसने सारिपुत्र से अनेक प्रश्न किए, जिसका सारिपुत्र ने जवाब दे दिया। अंत में सारिपुत्र ने उससे प्रश्न किया, ‘वह सत्य क्या है, जो सबके लिए मान्य हो?’ भद्रा यह सुनते ही सकपका गई। पहली बार उसने किसी विद्वान के समक्ष समर्पण करते हुए कहा, ‘भंते, मैं आपकी शरण में हूं।’ सारिपुत्र ने उत्तर दिया, ‘मैं बुद्ध की शरण में हूं, उनका शिष्यत्व ग्रहण करो।’ भद्रा बुद्ध के पास पहुंची। बुद्ध ने उसे उपदेश देते हुए कहा, ‘देवी, किसी भी प्रकार का अहंकार समस्त सद्कर्मों व पुण्यों को क्षीण कर देता है। धर्म के केवल एक पद को जीवन में ढालो कि मैं ज्ञानी नहीं, अज्ञानी हूं।’ तथागत के शब्दों ने भद्रा को पूरी तरह अहंकारशून्य बना दिया

Friday, June 25, 2010

हस्त दर्शन

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एक ऋषि अपने छात्रों को वेदों का  अध्ययन करा रहे थे। उन्होंने ऋग्वेद के  एक मंत्र  अयं मे हस्तो भगवानयं में भगवत्तरः, अयं मे विश्वभेषजोडयं शिवाभिमर्शनः का अर्थ समझाया  जिसका अर्थ था  यह मेरा हाथ भगवान अर्थात ऐश्वर्यशाली है। यह अत्यंत भाग्यशाली है। यह दुनिया के सभी रोगों का चिकित्सक है। यह  कल्याणकारी स्पर्शवाला है। ऋषि ने कहा इस संदेश का अर्थ यही है कि हाथों से श्रम या पुरुषार्थ करने वाला सदैव सुखी, प्रसन्न तथा स्वस्थ रहता है। वैसे तो मानव शरीर का प्रत्येक अंग महत्वपूर्ण है, किंतु कर्म और पुरुषार्थ में हाथों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। हाथों से निरंतर काम  करते रहकर वैभवशाली  बना जा सकता है। जबकि हाथों पर हाथ धरे बैठा व्यक्ति निठल्ला कहलाता है। जब हम अपने हाथों से श्रम करते हैं, तब रोग स्वतः दूर रहने को मजबूर हो जाते हैं।’ स्वामी  के पास एक व्यक्ति पहुंचा। उसके चेहरे पर निराशा देखकर स्वामी जी ने इसका कारन पूछा ? उसने कहा, ‘धन की कमी  के कारण परेशान हूं। मैं अपने को सबसे बड़ा अभागा मानने लगा हूं।’ स्वामी जी ने उसका हाथ अपने हाथ में लिया और बोले, ‘अरे मूर्ख, इन दो हाथों के होते हुए भी अभागे कैसे हो? इनकी मुट्ठियों में तो तुम्हारा भाग्य है। निराशा त्यागो और इन हाथों से श्रम करो, ऐश्वर्य स्वयं तुम्हारे पास दौड़ा आएगा।’ यदि कोई महिला स्वादिष्ट भोजन बनाती है, तो कहा जाता है कि उसके हाथों में जादू है। कोई चिकित्सक रोगियों को स्वस्थ कर देता है, तो कहा ही जाता है कि उस डॉक्टर के हाथ की शफा है। अगर कोई सच्चा संत सिर पर हाथ रख दे, तो कहा जाता है कि हाथ के स्पर्श से अपूर्व शांति मिली है। भारतीय परंपरा में इसलिए तो सवेरे शैया से उठकर सर्वप्रथम हस्त दर्शन करने को शुभ माना गया है। 

Tuesday, June 22, 2010

विनम्रता और दया

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 सत्संग के लिए आने वालों से संत कबीर अकसर कहा करते थे कि अपने काम को पूरी लगन से करते हुए भगवान का चिंतन करते रहना चाहिए। एक दिन एक श्रद्धालु कबीर के दर्शन के लिए आया। उसने उनसे कहा, ‘बाबा आप तो दिन भर बैठे करघे पर कपड़ा बुनते रहते हैं। फिर भला भगवान का ध्यान-स्मरण कब कर लेते हैं?’ कबीर उसे अपने साथ लेकर गंगा तट पर पहुंचे। एक महिला गंगाजल से भरा गागर अपने सिर पर रखे लौट रही थी। गागर को उसने पूरी तरह छोड़ रखा था और मुंह से गंगा की महिमा के गीत गुनगुना रही थी। लेकिन गागर से एक बूंद भी गंगाजल नहीं छलक रहा था। कबीर उसकी तरफ इशारा करते हुए बोले, इस महिला को ध्यान से देखो। यह मुंह से गंगा का- भगवान का स्मरण कर रही है और इसे यह भी पूरा ध्यान है कि गागर गिर न पाए। दोनों काम एक साथ साधना इस महिला से सीखो। मैं भी हाथों से करघा चलाता हूं, और ऐसा करते हुए मुख से राम नाम जपता रहता हूं। परमात्मा का नाम तो हर क्षण भक्त के हृदय व मन में रमते रहना चाहिए।’ कबीर के इस उपदेश से जिज्ञासु की समस्या का समाधान हो गया। संत कबीर धर्म के नाम पर पनपने वाले आडंबर के घनघोर विरोधी थे। उन्होंने अपनी साखियों में अभिमान में अंधे, ढोंगी-नशेड़ी साधुओं पर काफी कठोर लहजे में प्रहार किए थे। अपने को चमत्कारी साधु या गुरु बताने वाले अहंकारी साधुओं पर उन्होंने लिखा, घर-घर मंतर देत फिरत हैं, महिमा के अभिमाना/ गुरु सहित शिष्य सब बूड़ें, अंत काल पछताना। कबीरदास का मत था कि वही साधु-महात्मा सच्चा गुरु कहलाने का अधिकारी है, जो स्वयं सदाचारी, संयमी और ज्ञानी है। जिसके मन में विनम्रता और दया का वास नहीं है, वह आखिर गुरु कैसे हो सकता है।

Sunday, June 20, 2010

विनम्रता

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शिक्षाविद और राजनेता डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी 1952 में भगवान बुद्ध के दो प्रधान शिष्यों सारिपुत्त और महमोग्गलामने के पवित्र भस्मावशेष लेकर म्यांमार गए थे। उसके बाद कंबोडिया के बौद्ध धर्मावलंबियों ने उन्हें अपने देश में आमंत्रित किया। कंबोडिया की राजधानी नॉमपेन्ह में आयोजित बौद्ध महासम्मेलन में उन्होंने कहा, ‘भगवान बुद्ध सनातन धर्मियों द्वारा दशावतार के रूप में पूजे जाते हैं। धर्म के नाम पर प्रचलित ऊंच-नीच की कुप्रवृत्ति के उन्मूलन में उनका योगदान सराहनीय है। उनके इस ऋण से हम कभी उऋण नहीं हो सकते।’ बौद्ध धर्म व दर्शन पर उनका भाषण सुनकर सभी प्रभावित हुए। सम्मेलन में उपस्थित कंबोडिया के एक बौद्ध लामा डॉ. मुखर्जी की श्रद्धा-भावना देखकर भाव-विह्वल हो उठे। वह मुखर्जी के पास पहुंचे और यह कहकर उनके पैरों की ओर झुके कि आप हमारे भगवान बुद्ध की पावन जन्मभूमि में जन्मे हैं, इसलिए हमारे लिए श्रद्धा भाजन हैं। इस पर मुखर्जी ने उन्हें रोकते हुए कहा, ‘आप भिक्षु हैं और हमारी संस्कृति में साधु-संतों के चरण स्पर्श करने की परंपरा है।’ यह कहते-कहते वह तुरंत उनके चरणों में झुक गए। डॉ. मुखर्जी जैसे अग्रणी नेता की इस विनम्रता को देखकर सभी हतप्रभ रह गए। डॉ. मुखर्जी परम धार्मिक व्यक्ति और विनम्रता की मूर्ति थे। 23 जून, 1953 को श्रीनगर में नजरबंदी के दौरान उनकी मृत्यु हो गई। नजरबंदी काल में भी प्रतिदिन दुर्गा सप्तशती का पाठ करने के बाद ही वह अन्न-जल ग्रहण करते थे

Saturday, May 22, 2010

साधु के लक्षण

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संत कबीरदास धर्म के नाम पर पाखंड करने वालों से बचकर रहने की प्रेरणा दिया करते थे। काशी के गंगातट पर वह किसी साधुवेशधारी को नशा करते या अमर्यादित आचरण करते देखते, तो उसे इन पाप कर्मों से बचने का सुझाव देते। एक बार किसी श्रद्धालु ने कबीर से पूछा, ‘साधु के लक्षण क्या होते हैं?’ उन्होंने तपाक से कहा, साधु सोई जानिए, चले साधु की चाल। परमारथ राता रहै, बोलै वचन रसाल। यानी संत उसी को जानो, जिसके आचरण संत की तरह शुद्ध हैं। जो परोपकार-परमार्थ में लगा हो और सबसे मीठे वचन बोलता हो। कबीरदास ने अपनी साखी में लिखा, ‘संत उन्हीं को जानो, जिन्होंने आशा, मोह, माया, मान, हर्ष, शोक और परनिंदा का त्याग कर दिया हो। सच्चे संतजन अपने मान-अपमान पर ध्यान नहीं देते। दूसरे से प्रेम करते हैं और उसका आदर भी करते हैं।’ उनका मानना था कि यदि साधु एक जगह ही रहने लगेगा,
तो वह मोह-माया से नहीं बच सकता। इसलिए उन्होंने लिखा, बहता पानी निरमला- बंदा गंदा होय। साधुजन रमता भला- दाग न लागै कोय। संत कबीरदास जानते थे कि ऐसा समय आएगा, जब सच्चे संतों की बात न मानकर लोग दुर्व्यसनियों की पूजा करेंगे। इसलिए उन्होंने लिखा था, यह कलियुग आयो अबै, साधु न मानै कोय। कामी, क्रोधी, मसखरा, तिनकी पूजा होय। आज कबीर की वाणी सच्ची साबित हो रही है तथा संत वेशधारी अनेक बाबा घृणित आरोपों में घिरे हैं।

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